मोहन सरकार में बिजुरी रेंजर का कायम है जंगल राज..... !
खाली ट्रैक्टर जप्त कर फर्जी मामला बनाकर रेंजर पवन ताम्रकार ग्रामीणों को कर रहे परेशान
बंद गेट के पीछे ड्राइवर की बेरहमी से पिटाई का वीडियो वायरल, आखिर डीएफओ और सीसीएफ रेंजर पवन ताम्रकार के रसूक के सामने क्यू बने हैं मूकदर्शक...?
बिजुरी में रेंजर का खूनी खेल गुंडागर्दी पर आला अफसर मेहरबान, क्या बर्णवाल के सुशासन में 'टॉर्चर' ही कानून है...?
इंट्रो- मुख्यमंत्री मोहन यादव के सरकार में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और न्याय के रहनुमा अपनी आंखें मूंद लें तो लोकतंत्र केवल कागजों पर बचता है। अनूपपुर के बिजुरी में वन विभाग के रेंजर पवन ताम्रकार की गुंडागर्दी ने सरकारी दफ्तर को टॉर्चर रूम में तब्दील कर दिया है लेकिन उससे भी ज्यादा शर्मनाक है वन विभाग के शीर्ष नेतृत्व का मौन।प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल (IAS), सीसीएफ और डीएफओ जैसे जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे एक निर्दोष ड्राइवर को बंद गेट के पीछे जानवरों की तरह पीटा जाता है 'रेत चोरी' का जुर्म कबूलवाने के लिए कस्टोडियल टॉर्चर किया जाता है जिसकी एक वीडियो भी सोसल मीडिया मे वायरल हो रही है हालांकि इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं और ये आला अफसर एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर व्हाट्सएप पर जांच की खानापूर्ति करते देखे जा रहे हैं। आखिर क्या मजबूरी है कि वीडियो साक्ष्य व मेडिकल होने के बावजूद रेंजर ताम्रकार पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मौन संरक्षण दिया जा रहा है...?क्या डीएफओ और सीसीएफ ने पीड़ित का पक्ष न सुनकर रेंजर की तानाशाही को अपनी मूक सहमति दे दी है? प्रमुख सचिव को दी गई लिखित शिकायत और वायरल वीडियो की चीखें क्या सचिवालय की दीवारों तक नहीं पहुँच रहीं...? यह चुप्पी इशारा करती है कि या तो सिस्टम पंगु हो चुका है या फिर इस अवैध वसूली के तंत्र की जड़ें बहुत ऊपर तक गहरी हैं। अगर इन शीर्ष अधिकारियों ने अब भी संज्ञान नहीं लिया तो यह माना जाएगा कि बिजुरी में मानवाधिकारों का कत्ल विभाग की मर्जी से हो रहा है और वायरल वीडियो देखने वाले लोगों द्वारा जमकर मोहन सरकार की किरकिरी की जा रही है!
प्रकाश सिंह परिहार कि कलम से
अनूपपुर- जिले नहीं पूरे संभाग में चर्चा है कि बिजुरी बीट में रेत का अवैध कारोबार अफसरों की मिलीभगत से फल-फूल रहा है। जब असली माफिया हाथ नहीं आते तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए निर्दोष ट्रैक्टर मालिकों पर 'कस्टोडियल टॉर्चर' किया जाता है। सीसीएफ (CCF) महोदय, वायरल वीडियो में ड्राइवर की चीखें क्या आपके कानों तक नहीं पहुँच रहीं?भारतीय वन अधिनियम की धाराओं का दुरुपयोग कर रेंजर ने खुद को जज और पुलिस दोनों समझ लिया है। बिना सर्च वारंट गाड़ी उठाना और फिर उसे छोड़ने के बदले 25 हजार की मांग करना भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। क्या शासन ने अधिकारियों को जनता की सेवा के लिए रखा है या वसूली के लिए बंधक बनाने के लिए...? इस पूरे मामले में न्याय के आस में वाहन मालिक ड्राइवर एवं ग्रामीणों ने वन परिक्षेत्र बिजुरी के बाहर गलत कार्यवाही को लेकर टेंट लगाकर धरने मे न्याय की आस लगाए बैठे हैं लगभग 1 सप्ताह होने को है लेकिन जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रदेश के वन मंत्री दिलीप अहिरवार एवं अनूपपुर जिले के प्रभारी मंत्री होने के बाद भी न्याय मिलना इतना आसान नहीं जिसको लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और मोहन सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है!
रक्षक बना भक्षक, बंद गेट के पीछे ड्राइवर की बेरहमी से पिटाई
वन विभाग के नियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) स्पष्ट कहते हैं कि किसी भी आरोपी को शारीरिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती। लेकिन वायरल वीडियो में बिजुरी रेंजर कार्यालय का गेट बंद कर जानवरों की तरह पीटते अधिकारी कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वन अधिनियम 1927 की आड़ में किसी व्यक्ति को बंधक बनाकर जुर्म कबूल करवाने के लिए मारपीट करना अवैध हिरासत और मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है। क्या रेंजर ताम्रकार खुद को संविधान से ऊपर समझते हैं...?
खाली ट्रैक्टर बना अपराधी, रेंजर की जिद या अवैध वसूली का खेल...?
पीड़ित रवि सिंह बघेल का ट्रैक्टर (MP65ZA7949) खाली खड़ा था जिसे बिना किसी सर्च वारंट या जब्ती पंचनामा के उठाया गया। भारतीय वन अधिनियम की धारा 52 के तहत वाहन तभी जब्त किया जा सकता है जब उसमें वनोपज का अवैध परिवहन हो रहा हो। खाली वाहन को जब्त करना न केवल रेंजर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है बल्कि 25 हजार रुपये की कथित मांग भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।शिकायत करता ने बताया कि रेंजर का यह कहना कि अपराधी कैसे बनाना है मुझे पता है उनके पद के अहंकार और न्यायपालिका के प्रति अनादर को दर्शाता है।
रेजर की गंदी राजनीति-विरोध कुचलने के लिए SC-ST एक्ट का सहारा
अपनी बर्बरता को छिपाने के लिए रेंजर अब स्थानीय राजनीति और ढाल का प्रयोग कर रहे हैं। 15 जनवरी से जारी शांतिपूर्ण धरने को बदनाम करने के लिए महिलाओं और बच्चों को आगे कर प्रदर्शनकारियों पर SC-ST एक्ट लगवाने की साजिश रची जा रही है। डिप्टी रेंजर सतीश बैगा द्वारा गाली-गलौज और मोबाइल तोड़ना यह सिद्ध करता है कि विभाग अपनी गलती सुधारने के बजाय पीड़ित को ही अपराधी घोषित करने पर तुला है और विभाग के अधिकारी वायरल वीडियो को देखने के बाद भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं वहीं दूसरी ओर डिप्टी रेंजर शिकायत कर कार्यवाही की मांग कर रहे हैं वीडियो देखने के बाद नगर में जन चर्चा का विषय बना हुआ है कि रक्षक जब भक्षक बन जाए तो विश्वास किस पर जताया जा सकता है न्याय की मांग करने वाले पीड़ित लोग व ग्रामीणों को जिस षड्यंत्र के तहत डिप्टी रेंजर सतीश बैगा द्वारा फ़साने का प्रयास किया जा रहा है उससे यह प्रतीत हो रहा है कि रेंजर के प्रति समर्पित डिप्टी रेंजर न्याय मांगने बैठे पीड़ित को फ़साने के लिए किस स्तर पर उतारू हो सकते हैं जिससे फॉरेस्ट विभाग सहित प्रशासनिक हमले पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है और नगर सहित पूरे जिले में चर्चा का विषय भी बना हुआ है और नगर की जनता वर्दी का गलत इस्तेमाल करने वाले डिप्टी रेंजर पर सरकार सहित फॉरेस्ट विभाग के उच्च अधिकारियों से कठोर कार्यवाही कि मांग कि है!
डीएफओ और सीसीएफ की रहस्यमयी चुप्प व्हाट्सएप पर नोटिस
हैरानी की बात यह है कि 16 जनवरी को बिना किसी मौके-मुआयने के अज्ञात नंबरों से व्हाट्सएप पर कारण बताओ नोटिस भेज दिया गया। क्या मध्य प्रदेश वन विभाग की जांच अब जमीनी हकीकत के बजाय मोबाइल एप पर टिकी है? डीएफओ अनूपपुर और सीसीएफ शहडोल का इस पूरे प्रकरण पर मौन रहना उनकी कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या उच्च अधिकारियों का संरक्षण ही रेंजर पवन ताम्रकार को इतनी निरंकुशता प्रदान कर रहा है?
प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल (IAS) को सीधी चुनौती -कब जागेगा प्रशासन?
पीड़ित पक्ष ने सीधे प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल को पत्र लिखकर व व्हाट्सएप नंबर पर शिकायत भेजकर न्याय की गुहार लगाई है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि निर्दोष ड्राइवर और मालिक को न्याय नहीं मिला तो मामला 'उच्च न्यायालय' जाएगा। शासन के सुशासन के दावों पर यह प्रकरण एक बड़ा धब्बा है। जब सारे सबूत अनुबंध पत्र पीड़ित के पास हैं तो विभाग जांच से क्यों भाग रहा है? क्या प्रमुख सचिव अपने विभाग के नीचे फल-फूल रहे इस गुंडाराज पर लगाम लगाएंगे? या फिर किसान व ग्रामीण ऐसे अधिकारियों के शिकार बनते जाएंगे!
असली माफियाओं से साठगांठ, निर्दोषों पर कहर
क्षेत्र में चर्चा है कि बिजुरी बीट में वन विभाग की नाक के नीचे अवैध रेत उत्खनन का काला कारोबार धड़ल्ले से जारी है। सूत्र बताते हैं कि रेंजर और बीट गार्ड शुभम गुप्ता की मिलीभगत से बड़े माफिया सुरक्षित हैं और अपनी साख बचाने के लिए विभाग अडानी कंपनी में काम कर रहे निर्दोष ट्रैक्टरों को निशाना बना रहा है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि रेंजर का निलंबन और ट्रैक्टर की रिहाई नहीं हुई तो चक्का जाम कर पूरे क्षेत्र की व्यवस्था ठप कर दी जाएगी। यह मामला अब केवल एक ट्रैक्टर की जब्ती का नहीं बल्कि एक नागरिक के सम्मान और जीवन के अधिकार का है। यदि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो बिजुरी का यह जनाक्रोश भोपाल तक गूंजेगा।
रसूख की 'रेंज' में कानून -रेंजर पवन ताम्रकार को आखिर किसका संरक्षण....?
जिले सहित बिजुरी क्षेत्र व वन परिक्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आखिर रेंजर पवन ताम्रकार को किस 'अदृश्य शक्ति' का सहारा प्राप्त है? सूत्रों के अनुसार रेंजर साहब दबी जुबान में विभाग के मंत्री और रसूखदार रेत कारोबारियों से अपनी नजदीकी का हवाला देकर विभाग में अपनी हनक बनाए हुए हैं। क्या यही कारण है कि गंभीर आरोपों और वायरल वीडियो के बावजूद उच्चाधिकारी संज्ञान लेने से कतरा रहे हैं?एक सरकारी पद पर रहते हुए किसी अधिकारी का किसी विशेष 'संरक्षण' का दम भरना न केवल प्रशासनिक सेवा की गरिमा के विरुद्ध है बल्कि यह निष्पक्ष जांच की संभावनाओं को भी धूमिल करता है। क्षेत्र में चर्चा है कि रेंजर की इस 'कथित नेतागिरी' और रसूखदारों से साठगांठ के चलते ही निर्दोषों को निशाना बनाया जा रहा है जबकि जंगल से लकड़ी कटना व वन क्षेत्र से रेत निकालने का अवैध कारोबार धड़ल्ले से जारी है।जनता ने वन विभाग अशोक बर्णवाल प्रमुख सचिव से सवाल कर रही है कि क्या वन विभाग के नियम अब किसी अधिकारी के 'रसूख' और 'निजी संबंधों' के आधार पर तय होंगे? यदि एक रेंजर खुलेआम संरक्षण का दावा कर रहा है तो विभाग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।




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