बिजुरी नगर पालिका में 60 करोड़ का महाघोटाला, SECL की प्रतिबंधित भूमि पर बिना NOC के करा दिया अवैध निर्माण
स्वच्छता सामग्री और स्ट्रीट लाइट खरीदी में करोड़ों का स्टॉक गबन, एक ही कार्य का दो-दो बार निकाला फर्जी भुगतान
भ्रष्टाचार में डूबी परिषद को तुरंत भंग करने और धारा 41-क के तहत अध्यक्ष व पदाधिकारियों को पदमुक्त करने की उठी मांग
इंट्रो : अनूपपुर जिले की नगर पालिका बिजुरी में विकास के नाम पर शासकीय धन की ऐसी होली खेली गई है, जिसने भ्रष्टाचार के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। निकाय के जिम्मेदार पदाधिकारियों ने अपने अधिकारों का घोर दुरुपयोग करते हुए साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के आधिपत्य वाली कोयला बाहुल्य भूमि पर बिना किसी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के 50 से 60 करोड़ रुपये के निर्माण कार्य करा दिए हैं। यह वह भूमि है जो केंद्रीय कोयला मंत्रालय के अधीन है और खदान विस्तार के समय इसे कभी भी ध्वस्त किया जा सकता है। इतना ही नहीं, स्वच्छता सामग्री और स्ट्रीट लाइटों की खरीदी में बाजार दर से कई गुना अधिक दामों पर भुगतान कर करोड़ों का स्टॉक गबन किया गया है, जिसने परिषद की पूरी कार्यप्रणाली को ही गंभीर कठघरे में खड़ा कर दिया है।
अनूपपुर(रिज़वान खान) : -नगर पालिका बिजुरी द्वारा नियमों को ताक पर रखकर किए गए इन कारनामों ने शासन-प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे बड़े भ्रष्टाचार को उजागर किया है। मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1961 की धाराओं का खुला उल्लंघन करते हुए तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृतियां जारी कर दी गईं, जबकि भूमि का कोई कानूनी स्वामित्व ही नहीं था। केंद्रीय अधिनियमों जैसे कोल बेयरिंग एरिया अधिनियम 1957 और खान अधिनियम का यह सीधा उल्लंघन पूर्णतः अवैध अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। इस पूरे महाघोटाले में नगर पालिका अध्यक्ष, प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल (P.I.C.) और पूरी परिषद की संलिप्तता के अकाट्य प्रमाण सामने आए हैं, जिसके बाद अब दोषियों के खिलाफ
केंद्रीय कानूनों की धज्जियां- SECL की भूमि पर 60 करोड़ का अवैध निर्माण
नगर पालिका बिजुरी ने अपने अधिकार क्षेत्र का मनमाना अतिक्रमण करते हुए SECL के स्वामित्व वाली कीमती जमीनों पर करोड़ों के निर्माण कार्य करवा दिए। म.प्र. नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 114 एवं 119 के तहत नगर पालिका निधि का व्यय केवल निकाय के स्वामित्व वाली या वैध NOC प्राप्त भूमियों पर ही किया जा सकता है। इसके बावजूद, बिना किसी एनओसी के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, जो खदान विस्तार के दौरान कभी भी जमींदोज हो सकते हैं। बिना भूमि स्वामित्व के तकनीकी स्वीकृति (T.S.) और प्रशासकीय स्वीकृति (A.S.) जारी करना म.प्र. नगर पालिका लेखा तथा वित्त नियमों के विरुद्ध एक बड़ी तकनीकी खामी है, जो सीधे तौर पर केंद्रीय कोल बेयरिंग एरिया अधिनियम का खुला उल्लंघन है।
सामग्री खरीदी में महालूट- बाजार मूल्य से कई गुना अधिक दरों पर फर्जी भुगतान
नगर में स्वच्छता के नाम पर फिनायल, ब्लीचिंग पाउडर, फिटकरी, कीटनाशक दवाइयां और अमानक स्तर की स्ट्रीट लाइटों की खरीदी में करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा किया गया है। इन सामग्रियों को बाजार मूल्य से कई गुना अधिक दरों पर खरीदा दिखाकर सरकारी खजाने को भारी चपत लगाई गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बिलों में जितनी मात्रा दर्शाई गई है, उसकी तुलना में धरातल पर अत्यंत कम सामग्री की आपूर्ति की गई है। सामग्री की गारंटी और वारंटी की शर्तों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया, जिससे कुछ ही दिनों में लाइटें खराब हो गईं और दवाइयां निष्प्रभावी साबित हुईं।
स्टॉक गबन का खेल- बिना सप्लाई के टेबल टेंडर से निकाला दोहरा भुगतान
इस घोटाले की परतें तब और खुलीं जब यह पता चला कि एक ही कार्य का भुगतान निविदा (टेंडर) के माध्यम से तो निकाला ही गया, साथ ही उसी काम के लिए 1-1 लाख रुपये के फर्जी टेबल टेंडर भी पास करा लिए गए। म.प्र. भंडार क्रय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बिना किसी वास्तविक सप्लाई के कागजों पर ही भुगतान ले लिया गया। म.प्र. नगर पालिका (लेखा तथा वित्त) नियमों के तहत अनिवार्य स्टॉक रजिस्टर का संधारण नहीं किया गया और सक्षम अधिकारी द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले भौतिक सत्यापन को पूरी तरह से रोककर रखा गया। स्टॉक रजिस्टर में की गई फर्जी प्रविष्टियां भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत सीधे तौर पर धोखाधड़ी और जालसाजी का संगीन मामला बनाती हैं।
अध्यक्ष व P.I.C. की संलिप्तता-धारा 328 के तहत परिषद को भंग करने की तैयारी
इन तमाम फर्जी टेबल टेंडरों, बिना NOC के अवैध निर्माणों और मनमाने भुगतानों को P.I.C. और परिषद की बैठकों में जानबूझकर प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है। यह निर्वाचित पदाधिकारियों द्वारा अपने पद के घोर दुरुपयोग और वित्तीय गबन में प्रत्यक्ष भागीदारी का सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण है। इस महाघोटाले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए अब म.प्र. नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-क के तहत संलिप्त अध्यक्ष एवं पदाधिकारियों को तत्काल पदमुक्त करने की मांग की जा रही है। साथ ही शक्तियों के निरंतर दुरुपयोग के आधार पर धारा 328 के तहत वर्तमान परिषद को भंग कर, संबंधितों से पाई-पाई की शासकीय क्षति वसूलने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की चेतावनी दी गई है।


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