अध्यक्ष-सीएमओ-लेखपाल की 'केमिस्ट्री' ने सरकारी तिजोरी में लगा दी सेंध- साहब नपे पर 'मुनीम' और 'मुखिया' अब भी सुरक्षित
अध्यक्ष की छतरी, लेखपाल की सेटिंग और CMO की आईडी... ऐसे लगा सरकारी खजाने को चूना
बड़ा सवाल- पोर्टल पर आईडी साहब की, पर फाइल तो लेखपाल ने ही बनाई थी, फिर वह क्यों बचे...?
इंट्रो-नगर परिषद बनगवां में विकास की फाइलें भले ही धूल फांक रही हों लेकिन भ्रष्टाचार के 'सिंडिकेट' ने सरकारी खजाने को खाली करने में बिजली जैसी तेजी दिखाई है। अध्यक्ष यशवंत सिंह का तथाकथित 'अभय दान' लेखपाल राजेश मिश्रा की संदिग्ध 'तकनीकी जादूगरी' और प्रभारी सीएमओ राममिलन तिवारी की 'लॉगिन आईडी' के घातक गठजोड़ ने मिलकर अमृत 2.0 योजना को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया। प्रशासन ने सीएमओ तिवारी को सस्पेंड कर केवल 'पूंछ' पर प्रहार किया है जबकि घोटाले के असली सूत्रधार जो फाइलों के हेरफेर के उस्ताद हैं और जो सत्ता की कुर्सी पर बैठकर इस लूट को मौन सहमति दे रहे थे वे अब भी जांच की आंच से कोसों दूर हैं। आखिर क्या वजह है कि तकनीकी रूप से घोटाले की बुनियाद रखने वाले लेखपाल और नीतिगत मौन साधने वाले अध्यक्ष पर कमिश्नर की गाज अब तक नहीं गिरी...?
प्रकाश सिंह परिहार की कलम से
अनूपपुर-नगर परिषद बनगवां इन दिनों विकास की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की 'पटकथा' लिखने के लिए सुर्खियों में है। अमृत 2.0 योजना के तहत तालाबों और पार्कों के जीर्णोद्धार के नाम पर हुए करोड़ों के 'वित्तीय बंदरबांट' के मामले में शहडोल कमिश्नर ने प्रभारी सीएमओ राममिलन तिवारी को सस्पेंड कर दिया है। लेकिन भास्कर की पड़ताल में यह सवाल बड़ा होकर उभरा है कि क्या अकेले सीएमओ ने इस पूरे सिंडिकेट को चलाया? पोर्टल पर फाइलों को तकनीकी हरी झंडी देने वाले लेखपाल राजेश मिश्रा और नीतिगत फैसले लेने वाले अध्यक्ष यशवंत सिंह पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मुनीम जी की जादुई कलम
नगर परिषद के असली 'चाणक्य' तो लेखपाल राजेश मिश्रा हैं। चर्चा है कि साहब (CMO) तो आते-जाते रहते हैं लेकिन 'मुनीम जी' की जड़ें अंगद के पैर जैसी जमी हुई हैं। पोर्टल पर किसे 'राजा' बनाना है और किसे 'रंक' यह मिश्रा जी की उंगलियों का खेल है। तकनीकी रूप से हर भुगतान को 'प्योर' बताने वाले लेखपाल साहब पर अब तक कार्रवाई न होना चर्चा का विषय है। क्या मिश्रा जी के पास कोई ऐसी 'जड़ी-बूटी' है जिससे जांच की आंच उन तक नहीं पहुंचती...?
आखिर तकनीकी 'मास्टरमाइंड' पर चुप्पी क्यों...?
नगर परिषद के किसी भी वित्तीय भुगतान की प्रक्रिया लेखपाल (Accountant) राजेश मिश्रा की मेज से शुरू होती है। पोर्टल पर डिजिटल सिग्नेचर, फाइल की नोटिंग और बजट का मिलान करना लेखपाल की जिम्मेदारी है। सवाल यह है कि यदि सीएमओ ने गलत भुगतान किए तो क्या तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में लेखपाल ने उन्हें टोका नहीं? आखिर वह कौन सी मजबूरी या मिलीभगत थी कि लेखपाल ने फाइलें आगे बढ़ाईं? क्या बिना लेखपाल की 'इंजीनियरिंग' के इतना बड़ा घोटाला मुमकिन है?
तो क्या अध्यक्ष यशवंत सिंह की 'मौन' सहमति...?
परिषद के मुखिया होने के नाते अध्यक्ष यशवंत सिंह विकास कार्यों और भुगतान की निगरानी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। अमृत 2.0 जैसी महत्वपूर्ण योजना में करोड़ों की हेराफेरी हो रही थी और अध्यक्ष को इसकी भनक तक नहीं लगी, यह बात गले नहीं उतरती। पोर्टल पर आईडी का दुरुपयोग और संविदाकारों का भुगतान अटकने पर भी अध्यक्ष की चुप्पी उनकी भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है।
'मेकर-चेकर' सिस्टम की विफलता या सोची-समझी साजिश?
सरकारी पोर्टल (SNA Sparsh Portal) में 'मेकर' और 'चेकर' की व्यवस्था इसलिए होती है ताकि धोखाधड़ी न हो सके। प्रभारी सीएमओ राममिलन तिवारी ने इन दोनों आईडी का उपयोग कर भुगतान इधर-उधर किए। लेकिन प्रशासन यह जांच क्यों नहीं कर रहा कि इस प्रक्रिया में लेखपाल और अध्यक्ष की लॉगिन एक्सेस या उनके डिजिटल हस्ताक्षरों की क्या भूमिका थी? क्या CMO तिवारी ने अकेले ही पूरा सिस्टम हैक कर लिया था या बाकी सबने आंखें मूंद ली थीं..?
सिंडिकेट के बाकी चेहरों पर कब गिरेगी गाज...?
कमिश्नर की कार्रवाई ने यह तो साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार हुआ है लेकिन केवल सीएमओ को निलंबित करना 'अधूरा न्याय' नजर आता है। जब तक लेखपाल राजेश मिश्रा और अध्यक्ष यशवंत सिंह की जवाबदेही तय नहीं होती तब तक यह सिंडिकेट सक्रिय रहेगा। नगर की जनता पूछ रही है कि क्या आरोप पत्र में इन दोनों के नामों का जिक्र होगा या सीएमओ को सस्पेंड कर पूरे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है!
अगले अंक में पढ़ें - जुड़े रहिये हमारे साथ कार्यवाही की गिर रही गाज
....नाली रोड की जांच पर कार्यवाही के निर्देश


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