सुप्रीम कोर्ट के हंटर पर भारी ठेकेदार का रसूख, अनूपपुर प्रशासन ने ओढ़ा खामोशी का चादर
नदियों का कत्लेआम-सरहदें मिटाकर 3 KM तक डकैती के आरोप, 28 करोड़ के जुर्माने पर 'सरकारी कुंडली'
शिकायतों के बाद भी खनिज निरीक्षक की कुर्सी बरकरार, EOW-लोकायुक्त मौन, उच्च स्तरीय जांच की उठी मांग
इंट्रो -चंबल पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद भी अनूपपुर में प्रशासन की रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। प्राप्त शिकायतों के अनुसार, शहडोल कमिश्नर, अनूपपुर कलेक्टर और खनिज निगम की आंखों के सामने एसोसिएट कॉमर्स बेखौफ होकर नदियों का सीना चीर रहा है। शासन-प्रशासन ने मानो इस खुले खेल के आगे आत्मसमर्पण करते हुए बेशर्मी की चादर ओढ़ ली है। सर्वोच्च अदालत पर्यावरण बचाने के लिए सख्त है लेकिन यहाँ का महकमा ठेकेदार पर पूरी तरह मेहरबान नजर आ रहा है। यह सन्नाटा चीख-चीख कर बता रहा है कि सिस्टम को नियम-कानून से ज्यादा एक रसूखदार के मुनाफे की फिक्र है।
अनूपपुर(प्रकाश सिंह परिहार )-प्राप्त शिकायतों और जनचर्चा के अनुसार, खनिज विभाग के कागजों में आवंटित जमीन और हकीकत में हो रही खुदाई के बीच जमीन-आसमान का फासला है। ठेकेदार के 'मैनेजमेंट' ने कदमसरा, पसला और मानपुर तक 3 किलोमीटर का दायरा लांघकर नदी का भूगोल ही निगल लिया है। यदि सैटेलाइट मैपिंग से इस पूरे क्षेत्र की जांच कराई जाए, तो प्रशासन के बंद मॉनिटरों की पोल खुल जाएगी और 3 किलोमीटर की इस डकैती का सच बेनकाब हो जाएगा। विभाग का जीपीएस और ड्रोन सर्वे केवल एयर कंडीशनर कमरों में धूल फांक रहा है जबकि मैदान में नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं। यह राजस्व और प्रकृति का ऐसा चीरहरण है जिसे संदिग्ध पहरेदारी में बेखौफ अंजाम दिया जा रहा है।
एनजीटी को खुली चुनौती और सिसकती नदियां
अनूपपुर की जीवनदायिनी सोन और केवई नदियों में हैवी मशीनों की अंधी खरोंच ने जलधाराओं को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया है। आरोपों की जद में आए इस समूचे घटनाक्रम में एनजीटी के सख्त प्रावधानों को ठेकेदार के भारी बूटों और रसूख तले सरेआम कुचला जा रहा है। बीच नदी से रेत निकालने की इस अंधी हवस ने जलस्तर को रसातल में धकेल दिया है। आने वाले समय में कोतमा और आसपास के इलाकों में प्यास बुझाने के लिए पानी तक मयस्सर नहीं होगा। प्रशासन की यह अनदेखी साबित करती है कि उनके लिए पर्यावरण से बड़ा ठेकेदार का खजाना है।
28 करोड़ के जुर्माने पर 'सरकारी कुंडली'
चचाई की 28 करोड़ रुपये की जुर्माना फाइल सिस्टम के माथे पर एक बदनुमा दाग है जिसे संदेह के घेरे में लेते हुए ठंडे बस्ते में गाड़ दिया गया है। 'प्रदूषण फैलाने वाला ही हर्जाना भरेगा' का नियम अनूपपुर की चौखट पर आकर घुटने टेक देता है। एक तरफ सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगने के आरोप हैं तो दूसरी तरफ अधिकारी इस वसूली को दबाकर एसोसिएट कॉमर्स के बचाव में खड़े नजर आते हैं। जनता पूछ रही है कि इस भारी राशि की दंडात्मक वसूली को रोकने के पीछे वह कौन सी संदिग्ध डील है जिसने पूरे महकमे की जुबान सील कर दी है।
खनिज निरीक्षक की संदिग्ध कार्यप्रणाली
नदियों की इस अंधी खुदाई के बीच अनूपपुर में बरसों से अंगद की तरह पैर जमाए बैठीं खनिज निरीक्षक ईशा वर्मा की कार्यप्रणाली शिकायतों और जन चर्चा का मुख्य केंद्र बन चुकी है। शहर के चौक-चौराहों पर यह सवाल गूंज रहा है कि एसोसिएट कॉमर्स को यह अभयदान आखिर किस कुर्सी से मिल रहा है? आरोप है कि लंबे समय तक एक ही जगह जमे रहने से जो अघोषित नेक्सस पनपा है उसने विभाग की साख दांव पर लगा दी है। अब मांग जोर पकड़ रही है कि इनके कार्यकाल में हुए सीमांकन का उच्च स्तरीय ऑडिट हो ताकि इस संदिग्ध गठजोड़ की असलियत सामने आ सके।
इंटेलिजेंस फेल-EOW-लोकायुक्त मौन, मुखिया तक नहीं पहुंच रही 'चीख'
इस महाघोटाले में जिले का मुखबिर तंत्र पूरी तरह बौना साबित हो रहा है। बड़ा सवाल यह है कि आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) और लोकायुक्त जैसी राज्य की बड़ी जांच एजेंसियां आरोपों की जद में आए इस लूटतंत्र पर मूकदर्शक क्यों बनी हुई हैं? जनचर्चा है कि सूबे के मुखिया को स्थानीय अधिकारियों द्वारा गुमराह किया जा रहा है, जिससे इतने बड़े राजस्व नुकसान की खबरें भोपाल तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इस संदिग्ध संरक्षण का ही नतीजा है कि नदियों के इतने बड़े कत्लेआम के बावजूद ठेकेदार की मशीनें राजसात करने या कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई करने की जहमत आज तक नहीं उठाई गई है।





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