अनूपपुर में 28 करोड़ की राजस्व वसूली पर सनसनीखेज खुलासा- विभाग की रहस्यमयी चुप्पी या भ्रष्टाचार की तगड़ी सांठगांठ?
कलेक्टर के कड़े आदेश के 7 साल बाद भी सरकारी खजाना खाली-खोखले दावों के पीछे माफियाओं को अभयदान सरकार को राजस्व की हानी
तबादलों के तूफ़ान में भी 'अंगद' बनी खनिज इंस्पेक्टर की कुर्सी- करोड़ों के राजस्व नुकसान के पीछे कौन सा 'बड़ा मैनेजमेंट'?
इंट्रो :-मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में सरकारी राजस्व को चूना लगाने और खनन माफियाओं को खुलेआम शह देने का एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। चचाई आबाद सोन नदी रेत खनन घोटाला प्रकरण में 28 करोड़ 31 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना बीते 7 वर्षों से महज फाइलों में धूल चाट रहा है। इस घोर लापरवाही ने अब समूचे प्रशासनिक महकमे की नीयत और निष्ठा पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जिले की गरीब जनता मूलभूत स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं के लिए मोहताज है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र की यह कुंभकर्णी नींद किसी बहुत बड़े संस्थागत भ्रष्टाचार की तरफ साफ इशारा कर रही है।
अनूपपुर :- जिले की जीवनदायिनी सोन नदी का सीना बेरहमी से छलनी कर करोड़ों रुपये की अवैध रेत का काला कारोबार बेखौफ अंजाम दिया गया। तत्कालीन कलेक्टर चंद्र मोहन ठाकुर द्वारा अवैध खननकर्ता कमलेश सिंह चंदेल पर ठोका गया 28.31 करोड़ का ऐतिहासिक अर्थदंड 7 साल बीत जाने के बाद भी वसूला नहीं जा सका। प्रशासनिक निकम्मेपन और खनिज विभाग के ढुलमुल रवैये के चलते राज्य सरकार के राजकोष को सीधे तौर पर भारी राजस्व की चपत लग रही है। स्थानीय नागरिकों का सीधा आरोप है कि यदि यह विशाल राशि समय पर वसूल हो जाती, तो जिले के जर्जर अस्पताल और स्कूल संवर सकते थे। अब देखना यह है कि क्या वर्तमान जिला प्रशासन इस दबी हुई फाइल से पर्दा हटाकर अपराधियों पर शिकंजा कस पाएगा।
28 करोड़ का भारी-भरकम जुर्माना और 7 सालों की फाइली लिपापोती
कलेक्टर न्यायालय प्रकरण क्रमांक 41/बी-121/2016-17 के तहत खनन माफिया पर रायल्टी की 30 गुना दर से कुल ₹28,31,70,000 का अर्थदंड अधिरोपित किया गया था। जांच में पाया गया था कि स्वीकृत सीमा से बाहर जाकर प्रतिबंधित पोकलेन मशीनों के जरिए लगभग 94,390 घन मीटर बालू का अवैध उत्खनन किया गया। अदालती आदेश में स्पष्ट निर्देश थे कि तय समय सीमा में राशि जमा न होने पर चल-अचल संपत्ति कुर्क कर कड़े कानूनी कदम उठाए जाएं। लेकिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सात साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी विभाग ने कुर्की की एक भी पत्रावली आगे नहीं बढ़ाई। अधिकारियों का यह संदेहास्पद रवैया साफ बयां करता है कि किस तरह रसूखदारों को बचाने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
अवैध खनन के वसूली पर विभाग का अभयदान
राजस्व वसूली की कछुआ चाल को छिपाने के लिए अक्सर कोर्ट के 'स्टे' और कानूनी पेचीदगियों का झूठा राग अलापा जाता है। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि विभागीय अफसरों ने कभी इस भारी-भरकम वसूली को अंजाम देने की नीयत ही नहीं दिखाई। जानबूझकर फाइलों को दबाकर रखा गया ताकि समय बीतने के साथ यह करोड़ों का घोटाला ठंडे बस्ते में दफन हो जाए। सरकारी खजाने को चूना लगाकर रेत माफियाओं की जेबें भरने का यह गठजोड़ अब पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। यदि विभाग चाहता तो भू-राजस्व संहिता की धाराओं का इस्तेमाल कर तत्काल संपत्ति जब्त कर सकता था, पर ऐसा न करना बड़े लेन-देन की ओर इशारा करता है।
तबादलों की आंधी में भी 'अंगद' का पैर बनी खनिज की कुर्सी
सामान्य प्रशासनिक नियमों के अनुसार एक निश्चित समय सीमा के बाद अधिकारियों का तबादला होना अनिवार्य है ताकि कार्यप्रणाली पारदर्शी बनी रहे। लेकिन अनूपपुर खनिज विभाग में तैनात इंस्पेक्टर ईशा वर्मा के मामले में नियम-कायदों की सरेआम धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही हैं। जिले में कई कलेक्टर आए और चले गए, दर्जनों अधिकारी बदले, पर ईशा वर्मा की कुर्सी जस की तस अंगद के पैर की तरह जमी हुई है। पूरे जिले के चौक-चौराहों पर यह चर्चा गर्म है कि आखिर ऐसा कौन सा तगड़ा 'मैनेजमेंट' या आका है जिसके दम पर वे सालों से यहां काबिज हैं। क्या इसी अटूट राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण के कारण अवैध रेत तस्करी का नेटवर्क जिले में निर्बाध रूप से फल-फूल रहा है?
अनूपपुर में खनिज विभाग की बड़ी लापरवाही- 28 करोड़ की वसूली शून्य, ज़प्त वाहन रिहा
अनूपपुर ज़िले में अवैध रेत उत्खनन मामले में खनिज विभाग की एक और गंभीर लापरवाही सामने आई है। जहाँ एक तरफ़ विभाग अवैध खनन पर लगाए गए ऐतिहासिक 28 करोड़ 31 लाख रुपये के जुर्माने की वसूली सात साल बाद भी नहीं कर पाया है, वहीं अवैध परिवहन में लगे ज़प्त वाहनों को भी बिना किसी ठोस कार्रवाई के छोड़ दिया गया। ज़प्त जेसीबी पोकलेन और अन्य वाहनों को रिहा करने का यह निर्णय विभाग की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ज़िले की जनता इस दोहरी मार से आक्रोशित है, क्योंकि सरकारी खज़ाना खाली है और माफिया खुलेआम घूम रहे हैं। इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि खनन माफिया और प्रशासनिक तंत्र के बीच की सांठगांठ कितनी गहरी है।
जनता का हक मरा, क्या कलेक्टर लेंगे कड़ा एक्शन?
एक तरफ पूरा अनूपपुर जिला वेंटिलेटर पर पड़ी स्वास्थ्य सेवाओं और जर्जर स्कूली ढांचों की मार झेलने को मजबूर है तो दूसरी तरफ 28 करोड़ की विशाल राशि अफसरों की सुस्ती में अटकी है। यदि यह बकाया राजस्व ईमानदारी से वसूल कर लिया जाता, तो जिले के विकास कार्यों को एक नई दिशा मिलती और जनसुविधाओं का कायाकल्प हो सकता था। अब पूरे जिले की उम्मीदें नए कलेक्टर के प्रशासनिक चाबुक और सख्त तेवरों पर आ टिकी हैं। अब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या नया प्रशासन इस विशालकाय वित्तीय और पर्यावरणीय भ्रष्टाचार के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई करेगा या फिर सरकार को राजस्व की हानि पहुंचती रहेगी।
अगले अंक मे पढ़े -चरागाह की जमीन मे बंगला और रजिस्ट्री का खेल........

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