नगर परिषद बनगवां डोला डूमरकछार बकहो संविलियन घोटाले पर हाईकोर्ट का वज्रपात- अपात्रों की बर्खास्तगी वैध, अब कूटरचित दस्तावेज बनाने वालों पर एफआईआर की लटकी तलवार
सिंगल बेंच का फैसला निरस्त एमपी हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्वीकार कीं सरकार की 13 अपीलें, पिछले दरवाजे से घुसे कर्मियों को दिखाया बाहर का रास्ता
‘फर्जीवाड़े को संरक्षण नहीं’ धारा 331(2) के तहत पूरी सुनवाई देकर लिया गया था कड़ा एक्शन, साठगांठ कर सरकारी सेवा हथियाने वालों में मचा हड़कंप
इंट्रो :-अनूपपुर जिले की नगर परिषद बनगवां में हुए बहुचर्चित अवैध संविलियन महाघोटाले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर ने ऐतिहासिक और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति बी. पी. शर्मा की युगलपीठ ने सिंगल बेंच के आदेश को दरकिनार करते हुए फर्जी अभिलेखों के बूते घुसे अपात्र कर्मियों की बर्खास्तगी पर अंतिम मुहर लगा दी है। राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता की दलीलों पर मुहर लगाते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि मूल ग्राम पंचायत कर्मियों की जगह पिछले दरवाजे से आने वालों को कोई वैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता। शासन द्वारा नोटिस, व्हाट्सऐप व ऑनलाइन सुनवाई के पर्याप्त अवसर दिए जाने के चलते प्राकृतिक न्याय के हनन का कर्मचारियों का तर्क अदालत में औंधे मुंह गिर गया। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब ग्राम पंचायत के अभिलेखों में कूटकरण और जालसाजी कर सरकारी सेवा हड़पने वाले गिरोह पर आपराधिक एफआईआर दर्ज कराने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
अनूपपुर( प्रकाश सिंह परिहार) :-वर्ष 2016 में जब ग्राम पंचायत बनगवां को नगर परिषद में उत्क्रमित किया गया, तब पंचायत के वास्तविक कर्मियों और संपत्तियों के हस्तांतरण के नाम पर संगठित भ्रष्टाचार की नींव रखी गई। प्रशासकीय समिति और तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों की साठगांठ से पंचायत के मूल सेवकों को दरकिनार कर बाहरी व चहेते लोगों को फर्जी मस्टररोल के सहारे समायोजित कर दिया गया। जब शिकायतों के बाद नगरीय प्रशासन एवं विकास आयुक्त की उच्चस्तरीय जांच हुई, तो शासकीय सेवा भर्ती में व्यापक कूटकरण उजागर हुआ। जांच रिपोर्ट के आधार पर शासन ने म.प्र. नगरपालिका अधिनियम 1961 की धारा 331(2) के तहत 15 जुलाई 2022 को अवैध संविलियन रद्द कर 22 जुलाई को सभी अपात्रों की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। बर्खास्त कर्मचारियों ने सिंगल बेंच से तकनीकी आधार पर स्थगन हासिल कर लिया था, जिसे अब खंडपीठ ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। अदालत का यह फैसला जिले के उन सफेदपोशों और तत्कालीन जवाबदेह अफसरों के लिए सीधा झटका है, जिन्होंने कूटरचित फाइलों पर आंख मूंदकर दस्तखत किए थे।
सिंगल बेंच का आदेश निरस्त, खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने लड़ी निर्णायक कानूनी जंग
कर्मचारियों की रिट याचिकाओं पर सिंगल जज ने 23 जनवरी 2024 को यह कहते हुए निरस्तीकरण आदेश रद्द कर दिया था कि उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। इस तकनीकी राहत के खिलाफ राज्य सरकार ने अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह के जरिए खंडपीठ में सभी 13 रिट अपीलें साक्ष्यों के साथ मजबूती से पेश कीं। शासन ने साबित किया कि सिंगल बेंच का निष्कर्ष शासकीय रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के सर्वथा विपरीत था। सरकार ने प्रत्येक कर्मचारी को पूर्व सूचना देकर उनका पक्ष विस्तार से सुनने के बाद ही सेवा समाप्ति का कदम उठाया था। खंडपीठ ने शासन की दलीलों को शत-प्रतिशत सही पाते हुए माना कि अभिलेखों से छेड़छाड़ करने वालों पर हुई कार्रवाई पूर्णतः अधिकार-सम्मत और नियमसंगत थी। इस प्रकार सिंगल जज के फैसले को अपास्त करते हुए युगलपीठ ने शासन के सख्त प्रशासनिक निर्णय को पूरी तरह बहाल कर दिया।
नोटिस, व्हाट्सऐप और वर्चुअल सुनवाई- प्राकृतिक न्याय के पालन का हाईकोर्ट में मिला अकाट्य सबूत
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शासकीय पत्रावलियों की सूक्ष्म पड़ताल कर पाया कि शासन ने 1 अप्रैल 2022 को ही सभी प्रभावितों की सुनवाई की विधिवत कार्ययोजना तैयार कर ली थी। तय कार्यक्रम के अनुसार 22 और 23 अप्रैल 2022 को व्यक्तिगत नोटिस तामील कराकर कर्मियों को भौतिक रूप से सुनने का अवसर दिया गया। जो कर्मचारी अनुपस्थित रहे, उन्हें 12 मई 2022 को ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई का अतिरिक्त मौका प्रदान किया गया। अदालत में शासकीय रिकॉर्ड से प्रमाणित हुआ कि भौतिक नोटिस के अलावा सभी कर्मचारियों के मोबाइल पर व्हाट्सऐप के जरिए भी सूचना भेजी गई थी। अधिकांश कर्मियों ने नोटिस मिलने की बात स्वीकार करते हुए अपने विस्तृत लिखित जवाब भी विभाग में दाखिल किए थे। कोर्ट ने दो-टूक कहा कि भरपूर अवसर मिलने और लिखित जवाब देने के बाद 'नेचुरल जस्टिस' के उल्लंघन का कर्मचारियों का रोना पूरी तरह निराधार और अस्वीकार्य है।
धारा 7 व 331(2) के तहत सरकार का फैसला अधिकार-सम्मत, विभागीय जांच की बाध्यता नहीं
खंडपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में म.प्र.नगरपालिका अधिनियम 1961 की धारा 7 की मूल वैधानिक मंशा को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम सिर्फ निकाय गठन के ठीक पूर्व वास्तविक रूप से पदस्थ पंचायत सेवकों के समायोजन की अनुमति देता है, बाहरी व्यक्तियों की नहीं। जांच रिकॉर्ड से यह शीशे की तरह साफ हो चुका था कि पंचायत के मूल कर्मियों और संविलियन सूची में शामिल लोगों की संख्या में भारी अंतर था। अदालत ने विधि स्थापित की कि धारा 331(2) की पुनरीक्षण शक्तियों का उपयोग करने के लिए कोई औपचारिक विभागीय जांच (डीई) अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं है। जब अभिलेखों में हेराफेरी सामने आई, तो सक्षम प्राधिकारी को संविलियन निरस्त करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार था। सुप्रीम कोर्ट के 'उमा देवी' और 'श्रवण कुमार' नजीरों को भिन्न बताते हुए कोर्ट ने कहा कि फर्जीवाड़े से घुसे लोगों को सेवा सुरक्षा का कोई अधिकार नहीं है।
क्या अब दर्ज होगी एफआईआर? कूटरचित दस्तावेज बनाने वाले सिंडिकेट पर शिकंजे की तैयारी
हाईकोर्ट से बर्खास्तगी पर मुहर लगने के बाद अब सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह उठ रहा है कि क्या शासन फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों पर एफआईआर दर्ज कराएगा। जांच में यह प्रमाणित हो चुका है कि ग्राम पंचायत के मूल मस्टररोल और उपस्थिति रजिस्टरों में कूटकरण कर अपात्रों को पिछले दरवाजे से घुसाया गया था। प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि शासकीय दस्तावेजों से छेड़छाड़, धोखाधड़ी और सरकारी धन के गबन के इस मामले में बीएनएस/आईपीसी की सुसंगत धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज होना तय है। फर्जी भर्ती में शामिल तत्कालीन पंचायत सचिव, सरपंच, प्रशासकीय समिति के सदस्यों और जांच में चिन्हित अफसरों की भूमिका भी अब सीधे जांच के दायरे में है। संविलियन निरस्त होने के बाद इन अपात्रों द्वारा आहरित किए गए लाखों रुपये के वेतन-भत्तों की रिकवरी के साथ-साथ पुलिसिया जांच की मांग ने जोर पकड़ लिया है। शासन के आगामी कदम पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं कि इस संगठित सिंडिकेट को सलाखों के पीछे कब भेजा जाता है।

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