बाघों के 'इनवायोलेट ज़ोन' एसईसीएल मालाचुआ प्रोजेक्ट रद्द करने के बाद 5 गुना बड़ी प्राइवेट खदान मंजूर,एनजीटी पहुंचा मामला
1.5 लाख पेड़ों, 4 प्राकृतिक नालों और 22 दुर्लभ जीवों की बलि: 'मरवाटोला कोल प्रोजेक्ट' की संदिग्ध पर्यावरण स्वीकृति को चुनौती
उमरिया :- जिले के रौगढ़-मरवाटोला में बाघों के रहवास को तबाह करने वाली प्राइवेट कोल खदान की संदिग्ध पर्यावरण स्वीकृति (EC) को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी गई है। इस अपील ने वन विभाग और पर्यावरण मंत्रालय के 'दोहरे मापदंड' की पोल खोल दी है। दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2019 में ठीक इसी स्थान पर सरकारी कंपनी (SECL) की खदान को यह कहकर निरस्त कर दिया गया था कि यह बाघों का 'इनवायोलेट ज़ोन' (खनन मुक्त क्षेत्र) है। लेकिन, अब उसी सटीक जगह पर रामा सीमेंट की पांच गुना विशाल (1063 हेक्टेयर) खदान को नियम ताक पर रखकर मंजूरी दे दी गई है।
यह संदिग्ध अनुमति प्रकृति के महाविनाश का खुला मसौदा है। पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए इस खदान में 1 लाख 50 हज़ार सघन पेड़ों की बेरहमी से बलि दी जाएगी और 4 प्राकृतिक नालों को मोड़कर उनका वजूद मिटा दिया जाएगा। आधिकारिक रिपोर्टों में दर्ज है कि यह क्षेत्र सक्रिय बाघों की 'टेरिटरी' और कॉरिडोर है, जहाँ 22 प्रकार के संरक्षित दुर्लभ वन्यजीव वास करते हैं। इन सबके बावजूद वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस में अवैध छूट देकर टाइगर कॉरिडोर में ब्लास्टिंग का रास्ता साफ किया गया। एनजीटी में अपील दर्ज होने के बाद अब इस बात पर फैसला होगा कि क्या कोयले के लिए पूरे जंगल और बाघों के अस्तित्व को मिटाया जा सकता है? सवाल यह भी उठता है की जन 2019 में SECL ने एक छोटी खदान संबंधित क्षेत्र में खोलने की अनुमति मांगी थी तो वन विभाग और मंत्रालय ने बड़ा कड़ा रुख अख्तियार किया फिर सारे नियम शिथिल,अधिकारी शांत क्यों हो गए जब 5 गुना बड़े खदान की स्वीकृति देनी हुई तो। जबकि बाघों और अन्य संरक्षित जीवों की संख्या में वृद्धि दर्ज हुई।

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