नगर परिषद संविलियन महाघोटाले पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- अपात्रों की बर्खास्तगी वैध, तत्कालीन CMO राजेंद्र कुशवाहा का झूठा प्रपंच ध्वस्त
साले-साली को बांटीं अवैध नौकरियां, जबलपुर-पनागर के चहेतों को उपकृत कर सच उजागर करने वाले पत्रकारों पर उगला था जहर
कूटकरण के सिंडिकेट पर युगलपीठ की विधिक मुहर-अपात्रों सहित तत्कालीन CMO पर FIR की उलटी गिनती शुरू
इंट्रो :-अनूपपुर जिले की नवगठित नगर परिषद बनगवां, डोला और डूमरकछार में कूटरचित दस्तावेजों के दम पर हुए संविलियन महाघोटाले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अपात्र कर्मियों की बर्खास्तगी को पूर्णतः वैध ठहरा दिया है। इस फैसले ने न केवल पिछले दरवाजे से घुसे अवैध कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया, बल्कि सच की आवाज दबाने वाले तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) राजेंद्र प्रसाद कुशवाहा के अहंकार को भी चकनाचूर कर दिया है। घपलेबाजी पर पर्दा डालने और अपनी साली-साले सहित चहेतों की अवैध नियुक्तियां बचाने के लिए सीएमओ ने शासकीय पद का दुरुपयोग कर विद्वेषपूर्ण विज्ञप्ति जारी की थी। अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब सरकारी खजाना डकारने वाले अपात्रों के साथ-साथ दुर्भावनापूर्ण विज्ञप्ति जारी करने वाले तत्कालीन सीएमओ पर भी कानूनी शिकंजा कसना जरुरी है। चौथे स्तंभ की निष्पक्षता और निडर कलम के आगे अफसरों और दलालों का भ्रष्ट सिंडिकेट पूरी तरह बेनकाब होकर घुटनों पर आ टिका है।
अनूपपुर(प्रकाश सिंह परिहार) :-वर्ष 2016 में ग्राम पंचायतों के नगर परिषद में उन्नयन के दौरान भ्रष्ट तंत्र ने मूल कर्मचारियों की हकमारी कर फर्जी मस्टररोल और फर्जी उपस्थिति पंजियों के सहारे अपात्रों को सरकारी सेवा में खपाने का सुनियोजित खेल खेला था। संभागीय आयुक्त की उच्चस्तरीय जांच में जब भारी वित्तीय अनियमितता और कूटकरण की कलई खुली, तो राज्य शासन ने म.प्र. नगरपालिका अधिनियम 1961 की धारा 331(2) के तहत सभी अपात्रों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी थीं। इसके बाद बर्खास्त कर्मी सिंगल बेंच से प्राकृतिक न्याय की आड़ में तकनीकी स्थगन ले आए थे, जिसे अब हाईकोर्ट की युगलपीठ ने सिरे से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति बी. पी. शर्मा की युगलपीठ ने स्पष्ट कर दिया कि छल और कूटकरण से हासिल की गई किसी भी अवैध नौकरी को कानून का कोई संरक्षण नहीं मिल सकता। इस विधिक नजीर से साबित हो गया है कि निकाय गठन के समय केवल मूल पंचायत कर्मियों का ही संविलियन हो सकता है, किसी बाहरी का नहीं।
साले-साली और जबलपुर-पनागर के चहेतों की अवैध भर्ती, तत्कालीन CMO की काली करतूतें उजागर
दस्तावेजों और जांच से स्पष्ट प्रमाणित हो चुका है कि तत्कालीन सीएमओ राजेंद्र कुशवाहा ने पद का खुला दुरुपयोग करते हुए अपने सगे रिश्तेदारों को संविलियन की आड़ में रेवड़ियों की तरह नौकरियां बांटी थीं। इसमें डूमरकछार नगर परिषद में अपनी सगी साली आकांक्षा कुशवाहा और बनगवां नगर परिषद में अपने साले शैलेश वर्मा को कूट रचित दस्तावेजों के जरिए अवैध संविलियन में पिछले दरवाजे से भर्ती कराया गया। इतना ही नहीं, नियमों को ताक पर रखकर तीनों नगर परिषदों में लगभग 10-10 बाहरी कर्मचारी जबलपुर व पनागर से लाकर मस्टर कर्मचारी के रूप में खपाए गए, जिनका स्थानीय निकायों से कोई पूर्व संबंध नहीं था। अपने इस पारिवारिक व क्षेत्रीय सिंडिकेट को प्रशासनिक जांच से बचाने के लिए ही सीएमओ ने पूरी ताकत झोंक रखी थी। अब जब हाईकोर्ट ने इस फर्जीवाड़े की जड़ें काट दी हैं, तो इस महाघोटाले के असली सूत्रधार सीएमओ की प्रत्यक्ष संलिप्तता पूरी तरह उजागर हो चुकी है।
बौखलाए CMO का घटिया प्रपंच, सच उजागर करने वाले पत्रकारों पर मढ़े थे झूठे लांछन
जब खोजी पत्रकार विजय जायसवाल और प्रकाश सिंह परिहार ने बनगवां, डोला और डूमरकछार में करोड़ों की बंदरबांट और भाई-भतीजावाद का भंडाफोड़ किया, तो तत्कालीन सीएमओ राजेंद्र कुशवाहा पूरी तरह बौखला उठे थे। अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने शासकीय पद का दुरुपयोग कर एक अनाधिकृत और अमर्यादित प्रेस विज्ञप्ति जारी कर डाली। इसमें उन्होंने घोटाले से ध्यान भटकाने के लिए दोनों पत्रकारों को 'तथाकथित' बताते हुए उनकी पत्रकारिता पर ओछे सवाल खड़े किए। इतना ही नहीं, अपनी साख बचाने के लिए उन्होंने पत्रकारों पर ब्लैकमेलिंग, अवैध वसूली और फर्जी दबाव बनाने के मनगढ़ंत व हास्यास्पद आरोप थोप दिए। प्रशासनिक पद की हनक, मानहानि के मुकदमों की धमकियों और दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार के बावजूद पत्रकारों की कलम जरा भी नहीं डिगी और उन्होंने साक्ष्यों के दम पर सीएमओ के झूठ के सुरक्षा चक्र को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया।
युगलपीठ ने ध्वस्त किया सिंगल बेंच का स्थगन, फर्जीवाड़े पर चला विधिक बुलडोजर
सेवा समाप्ति के आदेश के खिलाफ बर्खास्त कर्मियों ने सिंगल जज की अदालत से यह तकनीकी आधार लेकर स्थगन हासिल कर लिया था कि उन्हें प्राकृतिक न्याय के तहत सुनवाई का अवसर नहीं मिला। इसके खिलाफ राज्य शासन ने अतिरिक्त महाधिवक्ता के जरिए हाईकोर्ट की युगलपीठ में सभी 13 रिट अपीलें पेश कर पूरे दस्तावेज और अकाट्य साक्ष्य सामने रखे। अदालत ने पाया कि शासन ने अप्रैल 2022 में भौतिक नोटिस और मई 2022 में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विधिवत सुनवाई देकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का शत-प्रतिशत पालन किया था। हाईकोर्ट ने म.प्र. नगरपालिका अधिनियम की धारा 7 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि धारा 331(2) के तहत अवैध नियुक्तियों को निरस्त करने के लिए किसी औपचारिक विभागीय जांच (डीई) की अनिवार्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की विधिक नजीरों के आधार पर युगलपीठ ने सिंगल बेंच के आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए बर्खास्तगी को बहाल कर दिया।
नगरीय प्रशासन विभाग की चुप्पी पर सुलगते सवाल, भ्रष्ट सिंडिकेट और तत्कालीन CMO पर FIR तय
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि साले-साली और चहेतों को उपकृत करने वाले तत्कालीन सीएमओ पर आखिर नगरीय प्रशासन विभाग अब तक मेहरबान क्यों है? जब कूटकरण और फर्जीवाड़ा न्यायालय में सिद्ध हो चुका है, तब जांच के दायरे में आने के बावजूद राजेंद्र कुशवाहा पर विभागीय व दंडात्मक कार्रवाई करने से शासन क्यों बच रहा है? जिलेभर में अब यह जनमांग प्रचंड हो चुकी है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले तत्कालीन सचिवों, सरपंचों और घपलेबाजों को संरक्षण देने वाले तत्कालीन सीएमओ राजेंद्र कुशवाहा पर तत्काल आपराधिक एफआईआर दर्ज की जाए। इसके साथ ही इन अपात्रों द्वारा वर्षों तक अवैध रूप से आहरित किए गए जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपयों के वेतन-भत्तों की अविलंब रिकवरी सुनिश्चित की जाए। सच को दबाने के लिए सत्ता और पद का दुरुपयोग करने वालों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाना अब प्रशासनिक साख का सवाल बन चुका है।


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